माओवाद का दोहरा चरित्र…


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  • राजधानी से लोकतंत्र के पर्व में शामिल होने की थी इजाजत उपराजधानी में था बहिष्कार का फरमान, बूथ कर रहे हैं बयां

  • बस्तर क्रान्ति बिग स्टोरी

पुष्पेंद्र सिंह

दंतेवाड़ा। लोकतंत्र का पवित्र पर्व और बस्तर का नाम आते ही तमाम तस्वीरें कौंदने लगती है। माओवादी संगठन इस बार किस करवट बैठेगा? लाल आतंक का कहर किस हद तक जाएगा? सवाल भी कई खड़े हो जाते है। इन सवालों का जबाब तीन दसक से बस्तर के नेताओं ने नहीं खोजा। माओवाद की पक्ष-विपक्ष की बात कर चुनावी मुद्दे बने और वोटों की रोटी सेंकी गई। २०१८ के इस विधान सभा चुनाव में बड़ा ही दिलचस्प आंकड़ा निकल कर सामने आ रहा है। जिस अबूझमाड़ को माओवाद की राजधानी कहा जाता है, वहां से वोटर निकला और वोट किया। यह इलाका पुरी तरह से माओवाद की चपेट में है। इंद्रावती नदी पार जितनी भी पंचायतें है लाल आतंक के साए में है। कुछ पंचायतों के नाम चेरपाल,तुमरीगुंडा, काउरगांव,पाहुरनार और छोटे करका है। यहां के वोटर नदी पार कर आए और अपने पसंदीदा प्रत्याशी को वोट किया। अब नदी के इस पार की पंचायत मुचनार, कोरकुटी,छिंदनार भी अबूझमाड़ का ही हिस्सा मानी जाती है। इन बूथों का आंकलन किया जाए तो करीब सात हजार वोट पड़ा। माओवाद की राजधानी से वोटरों का इजाजत के बिना वोट पडऩा किसी के गले नही उतरता है। इस बात को पुलिस अधिकारी भी मानते हैं। वहीं माओवाद की दूसरी तस्वीर एक और है। यह इलाका अरनपुर-जगुरगुंडा है। इसे माओवाद की उपराजधानी का नाम दिया गया है। यहां माओवादियों ने फरमान सुनाया था कि कोई वोट नहीं डालेगा। इस बहिष्कार के फरमान का पूरा अमल हुआ। नीलावाया,बुरगुम,पोटाली, जेबेली, ककाड़ी, अरनपुर, मुलेर और मेड़पाल जैसे बूथों में ५ प्रतिशत से भी कम वोट पड़े। लोहनगरी के कुछ बूथ भी है जहां वोट डालने की ग्रामीण हिमाकत नहीं कर सके। फरमान की दहशत ऐसी थी सडक़े तक काट दी गई थी। स्कूलों की दीवारें पर नारे लिख दिए गए थे। माओवद  की उपराजधानी में १५ प्रतिशत से कम वाले बूथों में १६ हजार दौ सौ ९३ वोटर हैं। इनको मताधिकार का अधिकार है, लेकिन इन्हेंं पर्व में शामिल होने की इजाजत नहीं थी। इस तरह के जिले में २० बूथों का माओवादी नेताओं ने प्रभावित किया। वही माओवाद की राजधानी से ७ हजार के करीब वोटरों को इजाजत के साथ निकाला गया। नदी पार और नदी के इस पार के वोटरों ने ८० प्रतिशत कई बूथों का मतदान पहुुंचाया। दोहरे चरित्र को देख कर लोग कह रहे हैं कि किसी एक दल को माओवादियों ने सपोर्ट किया है। इस बात का खुलासा तो नहीं है लेकिन उसकी जीत निश्चत है।

सीपीआई नहीं मानती माोओवादियों के सपोर्ट को

भले ही लोग कहें कि माओवादी सीपीआई को सपोर्ट करते हैं। लोग यह कहते है कि माओवादी और सीपीआई एक दूसरे के पूरके  है। सीपीआई  राष्ट्रीय सचिव सदस्य अमरजीत कौर ने प्रचार के दौरान किरन्दुल में साफ कहा था कि मओवादियों का विरोध करो। ग्रामीणों से अपील की थी कि बिना डरे लोकतंत्र की इस पवित्र प्रकिया में शामिल हो। बहिष्कार हल नहीं है। माओवादी संगठन दूसरे दलों से पैसा लेकर वोट करवाते है। इस बात में दम भी लग रहा है। माओवादी के दो गढों से अलग-अलग तस्वीरों ने पूरा माजरा ही स्पष्ट ही कर दिया है।

हर दल का अपना-अपना राग

भाजपा- कांग्रेस भी माओवाद के नाम पर रोटी सेंकती नजर आई। भाजपा ने कहा उनको तो अंदरनी इलाकों में घुसने ही नही दिया गया। भाजपा के विकास से मााओवदी बौख्लाए हुए है। उनके घुसते ही मार देने का फरमान है। इस तरह के वक्तव्य भाजपा नेताओं के मुखारबिंदु पर थे। इधर कांग्रेस का कहना था कि माओवादी उन पर हमला करते है। उनके टॉप के नेताओं को २०१३ में मार दिया। यह सब कुछ सरकार के इशारे पर हुआ। इन दोनों के बयान के बाद लगता है सीपीआई से गठजोड़ है। सीपीआई का दावा है कि यदि समर्थक होते तो एक भी विधानसभा चुनाव नहीं हारते। तीनों दलों की बातें तो साफ है और स्पष्ट भी।  लेकिन विधान सभा क्रमांक ८८ में अबूझमाड़ के मतदाताओं का मत का प्रयोग बड़ा सवाल खड़े कर रहा है। माओवाद की राजधानी की इस भीड़ का रुख किस दल के लिए था। माओवाद की उपराजधानी में फरमान का इतना बड़ा असर क्यों रहा?इन सवालों के जबाब तो नही मिलते लोग इस बात को जरूर कहते है अब कुछ मत कहलवाओ सेंटिंग-गेटिंग और मीटिंग का खेल है।


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